बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बगहा की धरती पर मंगलवार को गुस्सा नहीं, बल्कि टूटी हुई उम्मीदें सड़कों पर उतर आईं। कैलाशनगर में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग हाथों में तख्तियां और आंखों में आक्रोश लिए सरकार के फैसले के खिलाफ खड़े नजर आए। यह विरोध उस प्रस्तावित पुल को लेकर है, जो शास्त्री नगर से उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के बेलवानिया तक बनना था और जिसे लोग वर्षों से अपने सपनों का रास्ता मान बैठे थे। लेकिन सरकार के हालिया फैसले ने मानो उसी रास्ते पर ताला जड़ दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब जनप्रतिनिधियों और एक केंद्रीय मंत्री की ओर से पुल निर्माण को लेकर स्वीकृति के संकेत मिले थे, तब बगहा ने पहली बार विकास को इतना करीब महसूस किया था। किसानों ने बेहतर बाजार तक पहुंच का सपना देखा था, व्यापारियों ने नए अवसरों की उम्मीद जगाई थी और छात्रों ने आसान आवागमन के सहारे अपने भविष्य को संवारने की तस्वीर मन में बसाई थी। मगर अचानक आए फैसले ने इन तमाम सपनों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया।
प्रदर्शनकारियों का दर्द इस बात को लेकर है कि शास्त्री
नगर बेलवानिया पुल को रद्द कर धनहा–रतवल पुल के चौड़ीकरण का प्रस्ताव देना उनके घाव पर मरहम नहीं, बल्कि नई पीड़ा देने जैसा है। लोगों का कहना है कि केवल चौड़ीकरण से न तो बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच की दूरी घटेगी और न ही बगहा को वह पहचान मिल पाएगी, जिसकी उसे वर्षों से सख्त जरूरत रही है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के बावजूद यह इलाका आज भी विकास की मुख्यधारा से कटे होने का दंश झेल रहा है। यह पुल सिर्फ कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं था, बल्कि हमारे भविष्य का आधार था। उनका मानना है कि यदि शास्त्री नगर से बेलवानिया तक पुल बनता, तो बगहा एक मजबूत सीमावर्ती व्यापारिक केंद्र के रूप में उभर सकता था। लेकिन अब एक बार फिर इस क्षेत्र को हाशिये पर धकेल दिए जाने का एहसास लोगों को भीतर तक कचोट रहा है।प्रदर्शन के दौरान “पुल नहीं तो विकास नहीं” के नारे लगातार गूंजते रहे। लोगों ने सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की और साफ चेतावनी दी कि यह आंदोलन यहीं नहीं रुकेगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक बगहा को उसका हक नहीं मिलेगा, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।





