
यस बिहार| बोधगया
मगध विश्वविद्यालय के हिंदी एवं मगही विभाग के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को “भक्ति आंदोलन की सांस्कृतिक भूमिका” विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन प्रेमचंद सभागार, हिंदी भवन में किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।
संगोष्ठी की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार सिंह ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के सह आचार्य डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव उपस्थित रहे।
विषय प्रवेश करते हुए जगजीवन कॉलेज की डॉ. संगीता कुमारी ने भक्ति की परिभाषा और उसके स्वरूप पर प्रकाश डाला। अपने संबोधन में डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि भक्ति आंदोलन उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की उपज था, जिसने भारतीय समाज में व्यापक सांस्कृतिक चेतना का विकास किया।
उन्होंने विभिन्न विद्वानों के विचारों का उल्लेख करते हुए भक्ति आंदोलन की सांस्कृतिक भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही संत परंपरा की निर्गुण धारा में इस्लाम और ईसाई प्रभावों का जिक्र करते हुए वर्तमान संदर्भ में इसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी समाज को अपने इतिहास के तय मानकों में बदलाव करना होगा, ताकि साहित्य के इतिहास को निष्पक्ष दृष्टि से समझा जा सके। उन्होंने भक्ति काल और सामाजिक विभाजन से जुड़ी कुछ स्थापित अवधारणाओं पर असहमति भी जताई।
इस अवसर पर पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. ब्रजेश कुमार राय, अनुज कुमार तरुण, डॉ. परम प्रकाश राय, डॉ. किरण कुमारी, डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. रवि सहित कई शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन सुशीला कुमारी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राकेश कुमार रंजन ने दिया।

